Thursday, September 26, 2013

जब किले में हजारों औरतों ने खुद को जिंदा जला दिया, क्यूंकि....

PHOTO : जब किले में हजारों औरतों ने खुद को जिंदा जला दिया, क्यूंकि....
जयपुर। दुनिया में सबसे अधिक किले और गढ़ यदि कहीं हैं तो वो राजस्थान में। राजस्थान के किसी भी हिस्से में चले जाइए, कोई न कोई दुर्ग या किला सीना ताने आपका इंतजार करता हुआ मिल जाएगा। आज हम बात करत हैं एक ऐसे ही दुर्ग की। जो अपनी खासियतों के कारण पूरी दुनिया में ख्यात है। इस किले का नाम है गागरोन। झालावाड़ जिले में स्थित यह किला चारों ओर नदी होने से घिरा हुआ है। जिसके कारण इसका नाम ही पड़ गया जल-दुर्ग।
कालीसिंध व आहू नदी के संगम स्थल पर बना यह दुर्ग आसपास की हरी भरी पहाडिय़ों की वजह से पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। गागरोन दुर्ग का विहंगम नजारा पीपाधाम से काफी लुभाता है। इन स्थानों पर लोग आकर गोठ पार्टियां करते हैं। लोगों के लिए यह बेहतर पिकनिक स्पॉट है।
गागरोन का किला अपने गौरवमयी इतिहास के कारण भी जाना जाता है। सैकड़ों बरस पहले जब यहां के शासक अचलदास खींची मालवा के शासक होशंग शाह से हार गए थे तो राजपूत महिलाओं ने खुद को दुश्मनों से बचाने के लिए जौहर कर दिया था। सैकड़ों की तादाद में महिलाओं ने मौत को गले लगा लिया था। इलाके में आज भी इन महिलाओं की बहादुरी के किस्से चर्चित हैं।
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इस शानदार धरोहर को कुछ महीने पहले ही यूनेस्को ने अपनी वर्ल्ड हेरिटेज साइट की सूची में शामिल किया है। इसके अलावा प्रदेश के पांच अन्य पहाड़ी किलों (दुर्ग) को भी शामिल किया गया है। इनमें आमेर महल, कुंभलगढ़, जैसलमेर, रणथंभौर और चित्तौड़ हैं। अब प्रदेश की आठ धरोहर दुनिया के नक्शे पर आ गई हैं। भरतपुर का घना पक्षी अभयारण्य और जयपुर का जंतर-मंतर सूची में पहले से ही हैं।
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अब गागरोन किले में यूनेस्को की टीम का सितंबर में आना प्रस्तावित है। गागरोन किले को विश्व धरोहर बनाए जाने के बाद यह टीम पहली बार झालावाड़ पहुंचेगी। टीम के सदस्य गागरोन किले में जाकर पर्यटकों के लिए किए गए विकास कार्य और सुविधाओं का जायजा लेंगे।
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गागरोन का किला झालावाड़ से करीब दस किलोमीटर दूर स्थित है। 722 हेक्टेयर भूमि पर फैला हुआ यह किला जल-दुर्ग होने के साथ साथ पहाड़ी दुर्ग भी है। यह एक ओर पहाड़ी तो तीन ओर से जल से घिरा हुआ है। किले के दो मुख्य प्रवेश द्वार हैं। एक द्वार नदी की ओर निकलता है तो दूसरा पहाड़ी रास्ते की ओर।
PHOTO : जब किले में हजारों औरतों ने खुद को जिंदा जला दिया, क्यूंकि....
इतिहासकारों के अनुसार, इस दुर्ग का निर्माण सातवीं सदी से लेकर चौदहवीं सदी तक चला था। पहले इस किले का उपयोग दुश्मनों को मौत की सजा देने के लिए किया जाता था।
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किले के अंदर गणेश पोल, नक्कारखाना, भैरवी पोल, किशन पोल, सिलेहखाना का दरवाजा महत्पवूर्ण दरवाजे हैं। इसके अलावा दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, जनाना महल, मधुसूदन मंदिर, रंग महल आदि दुर्ग परिसर में बने अन्य महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल हैं।

भानगढ़ राजकुमारी के इश्क में पगलाए तांत्रिक के शाप से बर्बाद हो गया एक राज्य

राजकुमारी के इश्क में पगलाए तांत्रिक के शाप से बर्बाद हो गया एक राज्य
भानगढ़ किले के रातों रात खंडहर में तब्दील हो जाने के बारे में कई कहानियां मशहूर हैं। इन किस्सों को सुनकर लोग मायावी और रहस्यों से भरे इस किले की ओर खिंचे चले आते हैं। सूर्यास्त से पहले इस खंडहर में लोग घूमते टहलते मिल जाएंगे। लेकिन 6 बजे के बाद यहां आने वालों का हाथ पकड़कर किले के बाहर कर दिया जाता हैं। किले की एक दीवार पर भारतीय पुरातत्व विभाग का बोर्ड लगा हैं। इस पर साफ साफ शब्दों में लिखा है सूर्यास्त के बाद प्रवेश वर्जित हैं। 


राजस्थान के अलवर जिले में सरिस्का नेशनल पार्क के एक छोर पर खड़ा है खंडहरनुमा भानगढ़। इस किले को आमेर के राजा भगवंत दास ने 1573 में बनवाया था। भगवंत दास के छोटे बेटे और मुगल शहंशाह अकबर के नवरत्नों में शामिल मानसिंह के भाई माधो सिंह ने बाद में इसे अपनी रिहाइश बना लिया।
भानगढ़ का किला चारों ओर से घिरा है जिसके अंदर घुसते ही दाहिनी ओर कुछ हवेलियों के अवशेष दिखाई देते हैं। सामने बाजार है, कहते है ये भानगढ़ का जौहरी बाजार था।जिसमें सड़क के दोनों तरफ कतार में बनी दो मंजिला दुकानों के खंडहर हैं। किले के आखिरी छोर पर दोहरे अहाते से घिरा तीन मंजिला महल है। लेकिन तीनों मंजिल लगभग पूरी तरह ढेर हो चुकी है।
राजकुमारी के इश्क में पगलाए तांत्रिक के शाप से बर्बाद हो गया एक राज्य
चहारदीवारी के अंदर कई दूसरी इमारतों के खंडहर बिखरे पड़े हैं। इनमें से एक में तवायफें रहा करती थीं और इसे रंडियों के महल के नाम से जाना जाता है। किले के अंदर बने मंदिरों में गोपीनाथ, सोमेश्वर, मंगलादेवी और केशव मंदिर मिल जाएंगे। सोमेश्वर मंदिर के बगल में एक बावली है। जिसे अब भी लोग अपने मुताबिक इस्तेमाल करते हैं। चाहे नहाना हो या कपड़े धोना..
राजकुमारी के इश्क में पगलाए तांत्रिक के शाप से बर्बाद हो गया एक राज्य
खंडहर बना भानगढ़ एक शानदार अतीत के बर्बादी की दुखद दास्तान है। किले के अंदर की इमारतों में से किसी की भी छत नहीं बची है। लेकिन हैरानी की बात है कि इसके मंदिर पूरी तरह महफूज है। इन मंदिरों की दीवारों और खंभों पर की गई नक्काशी इत्तला करती है कि यह समूचा किला कितना खूबसूरत और भव्य रहा होगा?

राजकुमारी के इश्क में पगलाए तांत्रिक के शाप से बर्बाद हो गया एक राज्य
माधो सिंह के बाद उसका बेटा छतर सिंह भानगढ़ का राजा बना। छतरसिंह 1630 में लड़ाई के मैदान में मारा गया। उसकी मौत के साथ ही भानगढ़ की रौनक घटने लगी। छतर सिंह के बेटे अजब सिंह ने नजदीक में ही अजबगढ़ (अजबगढ़ की कहानी अगले भाग में )का किला बनवाया और वहीं रहने लगा। आमेर के राजा जयसिंह ने 1720 में भानगढ़ को जबरन अपने साम्राज्य में मिला लिया। इस समूचे इलाके में पानी की कमी तो थी ही। लेकिन 1783 के अकाल में यह किला पूरी तरह उजड़ गया।
भानगढ़ के बारे में जो अफवाहें और किस्से हवा में उड़ते हैं। उनके मुताबिक इस इलाके में सिंघिया नाम का एक तांत्रिक रहता था। उसका दिल भानगढ़ की राजकुमारी रत्नावती पर आ गया। जिसकी सुंदरता समूचे राजपुताना में बेजोड़ थी।
राजकुमारी के इश्क में पगलाए तांत्रिक के शाप से बर्बाद हो गया एक राज्य
एक दिन तांत्रिक ने राजकुमारी की एक दासी को बाजार में खुशबूदार तेल खरीदते देखा। सिंघिया ने तेल पर टोटका कर दिया ताकि राजकुमारी उसे लगाते ही तांत्रिक की ओर खिंची चली आए। लेकिन शीशी रत्नावती के हाथ से फिसल गई और सारा तेल एक बड़ी चट्टान पर गिर गया। टोटके की वजह से चट्टान को ही तांत्रिक से प्रेम हो गया और वह सिंघिया की ओर लुढ़कने लगा।
चट्टान के नीचे कुचल कर मरने से पहले तांत्रिक ने शाप दिया कि मंदिरों को छोड़ कर समूचा किला जमींदोज हो जाएगा और राजकुमारी समेत भानगढ़ के निवासी मारे जाएंगे। आसपास के गांवों के लोग मानते हैं कि सिंघिया के शाप की वजह से ही किले के अंदर की सभी इमारतें रातों रात ध्वस्त हो गई। यहां रहने वालों को यकीन है कि रत्नावती और भानगढ़ के बाकी निवासियों की रूहें अब भी किले में भटकती हैं। इसके अलावा रात के वक्त इन खंडहरों में जाने वाला कभी वापस नहीं आता।
राजकुमारी के इश्क में पगलाए तांत्रिक के शाप से बर्बाद हो गया एक राज्य
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने सूरज ढलने के बाद और उसके उगने से पहले किले के अंदर घुसने पर पाबंदी लगा रखी है। दिन में भी इसके अंदर खामोशी पसरी रहती है। कई सैलानियों का कहना है कि खंडहरों के बीच से गुजरते हुए उन्हें अजीब सी बेचैनी महसूस हुई। किले के एक छोर पर केवड़े की झाडिय़ां हैं। हवा जब तेज चलती है तो केवड़े की खुशबू चारों तरफ फैल जाती हैं और किले का रहस्य और भी गाढ़ा हो जाता हैं।
राजकुमारी के इश्क में पगलाए तांत्रिक के शाप से बर्बाद हो गया एक राज्य
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने किले के अंदर मरम्मत का कुछ काम किया है। लेकिन निगरानी की व्यवस्था ठीक नहीं होने के कारण इसके बरबाद होने का खतरा बढ़ता जा रहा है। किले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का कोई दफ्तर नहीं है। दिन में कोई चौकीदार भी नहीं होता। पूरा किला बाबाओं और तांत्रिकों के हवाले रहता है।
राजकुमारी के इश्क में पगलाए तांत्रिक के शाप से बर्बाद हो गया एक राज्य
किले में बेपरवाह तांत्रिक बेरोकटोक अपने अनुष्ठान करते हैं। आग की वजह से काली पड़ी दीवारें और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के टूटे फूटे बोर्ड किले में उनकी अवैध कारगुजारियों के सबूत हैं। दिलचस्प बात यह है कि भानगढ़ के किले के अंदर मंदिरों में पूजा नहीं की जाती।
राजकुमारी के इश्क में पगलाए तांत्रिक के शाप से बर्बाद हो गया एक राज्य
किले में स्थित गोपीनाथ मंदिर में तो कोई मूर्ति भी नहीं है। तांत्रिक अनुष्ठानों के लिए अक्सर उन अंधेरे कोनों और तंग कोठरियों का इस्तेमाल करते है। जहां तक आम तौर पर सैलानियों की पहुंच नहीं होती। किले के बाहर पहाड़ पर बनी एक छतरी तांत्रिकों की साधना का प्रमुख अड्डा बताई जाती है। इस छतरी के बारे में कहा जाता है कि तांत्रिक सिंघिया वहीं रहा करता था।
राजकुमारी के इश्क में पगलाए तांत्रिक के शाप से बर्बाद हो गया एक राज्य
किले के खंडहरों में टंगी सिंदूर से रंगी अजीबोगरीब शक्लों वाली मूर्तियां कमजोर दिलवाले को भूतों के होने का अहसास करा देती हैं।किले में कई जगह राख के ढेर, पूजा के सामान, चिमटों और त्रिशूलों के अलावा लोहे की मोटी जंजीरें भी मिलती हैं। ऐसा लगता है कि इन जंजीरों का इस्तेमाल उन्मादग्रस्त लोगों को बांधने के लिए किया जाता है। ऐसे ही तमाम राजो रहस्यों को समेटे यह किला अपने सुंदर अतीत पर खंडहर की शक्ल में रोता तांत्रिकों का अड्डा बन बैठा हैं।

भगवान ने दिया है इन पत्थरों को ऐसा वरदान कि सुन चौंक जायेंगे आप!

भगवान ने दिया है इन पत्थरों को ऐसा वरदान कि सुन चौंक जायेंगे आप!
बिलासपुर. संगीत किसी भी प्रकार का हो, लोगों की रूचि के अनुसार वह उन्हें पसंद होता है। समय और परिस्थितियों के अनुसार संगीत सुनना बदलता रहता है। आपने वाद्य यंत्रों से निकलता संगीत तो बहुत सुना होगा लेकिन क्या कभी पत्थरो से संगीत निकलता सुना है? शायद नहीं! लेकिन ये सच है दुनिया का सबसे अद्भुत करिश्मा हो रहा है छत्तीसगढ़ के बस्तर में जहां पत्थरों से निकलती है घंटियों की आवाज।
 
यह सुनकर हर कोई अचरज में पड़ जाता है इसके पीछे क्या वजह है कोई नहीं जानता लेकिन श्रद्धालु इसे मां दंतेश्वरी का आशीर्वाद मानते हैं। इसके अलावा यहाँ एक ऐसा तालाब है जो कभी सूखता ही नहीं। माना जाता है कि यहाँ बहुत बड़ा खजाना है जिसकी रक्षा नाग- नागिन का जोड़ा करता है।
 
तो आइये जाने इस टीले और तालाब का क्या है रहस्य, बताते हैं कि एक बार बस्तर के राजा प्रवीर चंद भंजदेव की नानी श्याम कुमारी देवी अपने महाराज से रुष्ट हो गई और उन्होंने अपने महारज समेत अपने राजपाट का परित्याग कर दिया। उसके बाद चंद सैनिकों को लेकर रानी श्याम कुमारी देवी इसी गांव में आकर बस गई। उनके आने से ही इस गांव का नाम शामपुर पड़ गया। यहां आकर रानी श्याम कुमारी ने अपने कुलगुरु भैरम देव की स्थापना की जो आज एक टीले के रूप में हो गया है।

भगवान ने दिया है इन पत्थरों को ऐसा वरदान कि सुन चौंक जायेंगे आप!

एक दिन मां दंतेश्वरी ने रानी श्याम कुमारी देवी के सपनों में आकर उन्हें दर्शन दिया। मां दंतेश्वरी के दर्शन पाकर रानी बहुत खुश हुई। पेयजल की व्यवस्था के लिए रानी ने अपने सैनिकों को एक तालाब खोदने का आदेश दिया और सैनकों ने एक ही रात में इस पहाड़ पर एक तालाब खोद डाला।

बताते हैं कि तब से लेकर आज तक इस तालाब में कभी पानी की कमी नहीं हुई हमेशा भरा रहता है। इसके पीछे मां दंतेश्वरी का आशीर्वाद बताया जा रहा है।यहां के एक पुजारी ने बताया है कि पिछले 60-70 वर्षो से उनके पूर्वज इस मंदिर में पूजा अर्चना करते आ रहे हैं।
भगवान ने दिया है इन पत्थरों को ऐसा वरदान कि सुन चौंक जायेंगे आप!
पुजारी ने बताया कि जब यहां रानी श्याम कुमारी जब रूठकर आईं थी तो अपने साथ कुछ सैनिकों को ले आईं थी जो जब कहीं दूर जाते तो पत्थरो को टक्कर मारती तो उससे उत्पन होती ध्वनि जो घंटियों के समान बजती है।सैनिक इसे सुनकर वापस लौट आते थे।

भगवान ने दिया है इन पत्थरों को ऐसा वरदान कि सुन चौंक जायेंगे आप!

रानी श्याम कुमारी देवी के सपने में आकर मां ने उन्हें राजमहल लौट जाने की सलाह दी लेकिन वह दोबारा राजमहल लौट कर नहीं गई।
आज भी मंदिर के पास पत्थरों में मां दंतेश्वरी के पदचिन्ह साफ देखे जा सकते हैं। एक बार की बात है कि यहाँ कुछ ग्रामीण तालाब की खुदाई करने लगे तो अचानक तालाब से खजाना निकलने लगा। कहते हैं कि यहाँ महारानी द्वारा लाया गया खजाना भी दबा है। जिसकी रक्षा नाग-नागिन का एक जोड़ा करता है जो अक्सर लोगों को तालाब के आस-पास दिखता है। कहते हैं कि इस तालाब में स्नान करके भैरमदेव की पूजा-अर्चना करने के पश्चात यदि कोई मनुष्य 11 बार इस पत्थर को बजाता है तो उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

Wednesday, August 21, 2013

तस्वीर देखते ही पिता के दुश्मन की हो गई दीवानी, मूर्ती को पहना दी वरमाला

राजस्थान की धरा वीरो की शौर्य और बलिदान के लिए मशहूर है। यहां के योद्धाओं की गाथाएं आज भी बड़े गर्व से सुनाई जाती हैं। वीरों की वसुंधरा पर कई प्रेम कहानियां भी जो आज भी बहुत प्रचलित हैं। कभी कभी एक दासी के रूप के आगे नतमस्तक हो गया राज तो कभी राजा ने नाराज रानी ऐसी रूठी कि उसका नाम ही रूठी रानी पड़ गया।
 
 
dainikbhaskar.com अपने पाठकों के लिए राजस्थान की प्रेम कहानियां सीरीज में ऐसी ही कई कहानियां लेकर आया है। आज की कड़ी में आपको बता रहे हैं  एक ऐसे प्रेमी की कहानी जिसने अपनी प्रेमिका का अपहरण उसके पिता के सामने उस वक्त कर लिया जब उसका स्वयंवर चल रहा था। 
 
 
 
दिल्ली की राजगद्दी पर बैठने वाले अंतिम हिन्दू शासक और भारत के महान वीर योद्धाओं में शुमार पृथ्वीराज चौहान का नाम कौन नहीं जानता। एक ऐसा वीर योद्धा जिसने अपने बचपन में ही शेर का जबड़ा फाड़ डाला था और जिसने अपनी आंखे खो देने के बावजूद भी मोहम्मद गौरी को मृत्यु का रास्ता दिखा दिया था।
 
 
पृथ्वीराज चौहान एक वीर योद्धा ही नहीं एक महान प्रेमी भी थे जो कन्नौज के महाराज जय चन्द्र की पुत्री संयोगिता से प्रेम करते थे।दोनों में प्रेम था यह सभी जानते हैं और यह भी जानते हैं कि पृथ्वीराज ने संयोगिता का अपहरण कर उनसे प्रेम विवाह किया था लेकिन इस प्रेम कहानी की शुरुआत काफी रोचक है, आइये हम आपको बताते हैं कि  आखिर कैसे शुरू हुई संयोगिता और पृथ्वीराज चौहान की प्रेम कहानी।
 तस्वीर देखते ही पिता के दुश्मन की हो गई दीवानी, मूर्ती को पहना दी वरमाला
बात उन दिनों की है जब पृथ्वीराज चौहान अपने नाना और दिल्ली के सम्राट महाराजा अनंगपाल की मृत्यु के बाद दिल्ली की राज गद्दी पर बैठे।गौरतलब है कि महाराजा अनंगपाल के कोई पुत्र नहीं था इसलिए उन्होंने अपने दामाद अजमेर के महाराज और पृथ्वीराज चौहान के पिता सोमेश्वर सिंह चौहान से आग्रह किया कि वे पृथ्वीराज को दिल्ली का युवराज घोषित करने की अनुमति प्रदान करें।
महाराजा सोमेश्वर सिंह ने सहमती जता दी और पृथ्वीराज को दिल्ली का युवराज घोषित किया गया, काफी राजनीतिक संघर्षों के बाद पृथ्वीराज दिल्ली के सम्राट बने।
 
उसी समय कन्नौज में महाराज जयचंद्र का राज था और उनकी एक खूबसूरत राजकुमारी थी जिसका नाम संयोगिता था।जयचंद्र पृथ्वीराज की यश वृद्धि से ईर्ष्या का भाव रखा करते थे।
उसी समय कन्नौज में महाराज जयचंद्र का राज था और उनकी एक खूबसूरत राजकुमारी थी जिसका नाम संयोगिता था।जयचंद्र पृथ्वीराज की यश वृद्धि से ईर्ष्या का भाव रखा करते थे।
एक दिन कन्नौज में एक चित्रकार पन्नाराय आया जिसके पास देश-दुनिया की कई हस्तियों के चित्र थे और उन्ही चित्रों में एक चित्र था दिल्ली के युवा सम्राट पृथ्वीराज चौहान का।जब कन्नौज की लड़कियों ने पृथ्वीराज के चित्र को देखा तो वे देखते ही रह गईं, हर कोई पृथ्वीराज की सुन्दरता का बखान कर रहीं थीं।
 
पृथ्वीराज की बढाई संयोगिता के कानों तक भी पहुंची और वे पृथ्वीराज के उस चित्र को देखने के लिए लालायित हो उठीं। संयोगिता अपनी सहेलियों के साथ उस चित्रकार के पास पहुंची और चित्र दिखाने को कहा, जैसे संयोगिता ने पृथ्वीराज का चित्र देखा वे मोहित हो गईं और वह चित्र चित्रकार से ले लिया। इधर चित्रकार ने दिल्ली पहुंचकर पृथ्वीराज से भेट की और राजकुमारी संयोगिता का एक चित्र बनाकर उन्हें दिखाया जिसे देखकर पृथ्वीराज के मन में भी संयोगिता के लिए प्रेम उमड़ पडा।
तस्वीर देखते ही पिता के दुश्मन की हो गई दीवानी, मूर्ती को पहना दी वरमाला

उन्हीं दिनों महाराजा जयचंद्र ने संयोगियिता के लिए एक स्वयंवर का आयोजन किया जिसमें विभिन्न राज्यों के राजकुमारों और महाराजाओं को आमंत्रित किया लेकिन ईर्ष्यावश पृथ्वीराज को उन्होंने इस स्वंयवर में आमंत्रित नहीं किया और उनका अपमान करने के उद्देश्य से उनकी एक मूर्ती को द्वारपाल की जगह खडा कर दिया।
जब राजकुमारी संयोगिता वर माला लिए सभा में आईं तो उन्हें अपने पसंद का वर नजर नहीं आया तभी उनकी नजर द्वारपाल की जगह रखी पृथ्वीराज की मूर्ती पर पड़ी और उन्होंने आगे बढ़कर वरमाला उस मूर्ती के गले में डाल दी।

वास्तव में वहां मूर्ती की जगह पृथ्वीराज स्वयं आकर खड़े हो गए थे।संयोगिता द्वारा पृथ्वीराज के गले में वरमाला डालते देख जयचंद्र आग बबूला हो गया और वह तलवार लेकर संयोगिता को मारने के लिए दौड़ा लेकिन पृथ्वीराज संयोगिता को अपने घोड़े पर बिठाकर वहां से अपने राज्य ले गए।
आगे जयचंद्र ने पृथ्वीराज से बदला लेने के उद्देश्य से मोहम्मद गौरी से मित्रता की और दिल्ली पर आक्रमण कर दिया।पृथ्वीराज ने मोहम्मद गौरी को 17 बार परास्त किया लेकिन 18वीं बार मोहम्मद गौरी ने धोखे से उन्हें गिरफ्तार कर लिया और तपती हुईं सलाखों से उनकी फोड़ दीं।
फिर भी पृथ्वीराज ने हार नहीं मानी और अपने मित्र चन्द्रवरदाई के शब्दों के संकेतों को समझ मोहम्मद गौरी को मार डाला।साथ ही दुश्मनों द्वारा दुर्गति से बचने के लिए चन्द्रवरदाई और पृथ्वीराज ने एक-दूसरे का वध कर दिया।जब संयोगिता को इस बात की जानकारी मिली तो वह एक वीरांगना की भांति सटी हो गई।इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में आज भी यह प्रेमकहानी अमर है। 

तस्वीर देखते ही पिता के दुश्मन की हो गई दीवानी, मूर्ती को पहना दी वरमाला

Monday, August 19, 2013

सबसे 'बदनाम' नृत्यांगना को जब इस किले में किया गया कैद !

मैं हूं आपका नाहरगढ़ का ऐतिहासिक किला। मेरा निर्माण 1734 में शुरू हुआ था। मुझे जयपुर के संस्थापक सवाई जयसिंह ने बनाया था। बेशक मैं आज इस शहर का प्रहरी या खूबसूरत पर्यटन स्थल बन चुका हूं। बरसात के मौसम में मेरी रवानी देखने लायक रहती है, पर मुझे बनाने के पीछे राजघराने की सुरक्षा सबसे बड़ी वजह थी। एक तरफ जब मुगलकाल का पतन था और दूसरी तरफ मराठा ताकतवर हो रहे थे, तब मेरा निर्माण कराया गया।
सबसे 'बदनाम' नृत्यांगना को जब इस किले में किया गया कैद !
मुझ तक पहुंचने के वैसे तो तीन रास्ते हैं, लेकिन आमेर महल वाला रास्ता तो जब राजपरिवार जयपुर रहने लगा, तब से इतना कारगर नहीं रहा है। 
सबसे 'बदनाम' नृत्यांगना को जब इस किले में किया गया कैद !
अलबत्ता कनक घाटी वाला 9 किलोमीटर का रास्ता सबसे ज्यादा व्यस्त रहता है, क्योंकि वो मुझे जयगढ़ से जोड़ता है। 

सबसे 'बदनाम' नृत्यांगना को जब इस किले में किया गया कैद !
पर्यटन के लिहाज से कार और बस से मुझ तक पहुंचने का आधुनिक मार्ग तो बहुत बाद में बना है। मेरा सबसे पुराना और सुरक्षित रास्ता शहर के बीच से यानी आज की पुरानी बस्ती से जाता है। 
सबसे 'बदनाम' नृत्यांगना को जब इस किले में किया गया कैद !
पथरीली राह लेकिन इतनी खूबसूरत और सर्पीली कि मुझ तक पहुंचने पर ये खूबसूरत हिल स्टेशन का अहसास कराती है। इस रास्ते से ज्यादातर पैदल या दुपहिया वाहन चालक रिस्क लेकर चढ़ते रहते हैं। वैसे राजाओं के जमाने में तो यहां से राजपरिवार हाथी, घोड़े और कहार पर सवार होकर जाते थे। वैसे मेरे आंगन में दो और खासियत हैं। पहली, यहां राजपरिवार का खजाना था, दूसरी यहां कैदियों या अपराधियों को नजरबंद किया जाता था। कहते हैं या शहर की मशहूर नृत्यांगना रस कपूर को भी कैद रखा गया था। साथ ही अवध के नवाब वाजिद शाह को भी इसमें शरण मिली थी। वैसे इसका मूल नाम सुदर्शनगढ़ था लेकिन बाघों के निवास की वजह से इसका नाम नाहरगढ़ पड़ा, लेकिन कहा यह भी जाता है कि नाहरसिंह भोमिया का मंदिर बना इसलिए भी इसका नाम नाहरगढ़ हो गया। महाराजा सवाई राम सिंह ने भी 1868 में इसका विकास कराया और महाराजा माधोसिंह मेरे भीतर माधवेंद्र महल बनाया था जिसमें 9 अलग-अलग सेक्शन बने हुए हैं जिसमें रानियों का निवास भी रहा था। 
सबसे 'बदनाम' नृत्यांगना को जब इस किले में किया गया कैद !
मेरे आंगन में बरसात के पानी पीने लायक बनाए रखने के लिए खूबसूरत बावडिय़ां भी बनाई गईं, जो आज भी पानी को बचाए रखने में सक्षम हैं। 
सबसे 'बदनाम' नृत्यांगना को जब इस किले में किया गया कैद !
मेरे एक हिस्से में बना ऐतिहासिक पड़ाव दीपावली पर सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र बनता है, जहां से लोग शहर की खूबसूरती को निहारते हैं। यह देखते हैं कि ये शहर अब कहां से कहां तक फैल गया और फल-फूल रहा है। 
सबसे 'बदनाम' नृत्यांगना को जब इस किले में किया गया कैद !
लेकिन नाहरगढ़ आज भी यह दोहराता है कि बेशक मैं ऊंचा हूं और मुझ तक पहुंचना थोड़ा दूभर है, लेकिन सच में सुरक्षित हूं। हमेशा एक निगहबान की तरह शहर को सुरक्षा देता रहूंगा। 
सबसे 'बदनाम' नृत्यांगना को जब इस किले में किया गया कैद !

इस गुफा में होती है मां का वध करने वाले ईश्वर की पूजा

 राजस्थान वैसे तो अपनी ऐतिहासिक किलों और धरोहरों के लिए जाना जाता है, लेकिन यहां की भूमि कई ऐसे स्थानों का भी गवाह है जहां देवताओं का वास होता है।
केवल यहां रहने वाले ही नहीं, बल्कि दूर-दराज के लोगों की भी इनमें गहरी आस्था होती है। ऐसी ही एक जगह है कुंभलगढ़ के पास परशुराम महादेव मंदिर। वही परशुराम जिन्होंने गुस्से में आकर मां रेणुका का वध कर दिया था।
कहा जाता है कि हजारों बार इस धरती से क्षत्रियों का नाश करने वाले परशुराम के पास अद्भुत शक्ति यहीं की देन है। उन्होंने यहीं पर गुफा में शिवलिंग के सामने बैठकर कठोर तपस्या की थी।
जिसके बाद उन्हें वो शक्ति मिली जिसका तोड़ किसी अन्य के पास नहीं था। ऐसी भी मान्यता है कि जहां पर यह शिवलिंग स्थापित है उस गुफा को खुद परशुराम ने अपने फरसे से काटकर बनाया था। इस गुफा मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 500 सीढ़ियों से होकर जाना होता है। 
इस गुफा में होती है मां का वध करने वाले ईश्वर की पूजा
राजस्थान में मेवाड़ और मारवाड़ के लिए यह स्थान किसी तीर्थ से कम नहीं। शायद यही वजह है कि हर साल लोग यहां सावन में भगवान के दर्शन करने आते हैं।
इस दौरान यहां तीन दिनों का मेला भी लगता है। खास बात यह है कि सावन के दिनों में मंदिर के चारों ओर का नजारा इतना मनोरम होता है मानो गुफा में बैठे भगवान परशुराम खुद प्रकृति की गोद में बैठ गए हों।
इस गुफा में होती है मां का वध करने वाले ईश्वर की पूजा
ऐसा बताया जाता है कि समुद्र तल से 3600 फुट ऊंचाई पर बने परशुराम महादेव मंदिर को विष्णु अवतार भगवान परशुराम ने बनाया है।
दंभ और पाखंड से धरती को त्रस्त करने वाले क्षत्रियों का संहार करने के लिए भगवान परशुराम ने इसी पहाड़ी पर स्थित स्वयंभू शिवलिंग के समक्ष बैठकर तपस्या करके शक्ति प्राप्त की थी।
इस गुफा में होती है मां का वध करने वाले ईश्वर की पूजा
परशुराम ने अपने फरसे से पहाड़ी को काटकर एक गुफा का निर्माण किया जिसमें स्वयंभू शिव विराजमान हैं, जो अब परशुराम महादेव के नाम से जाने जाते हैं। यहां पास ही में सादड़ी क्षेत्र में कुछ दूर चलने पर परशुराम महादेव की बगीची है।
कहा जाता है कि यहां पर भी भगवान परशुराम ने शिवजी की आराधना की थी।
फरसे द्वारा काटकर बनाई गई गुफा में स्थित मंदिर में अनेकों मूर्तियां, शंकर, पार्वती और स्वामी कार्तिकेय की बनी हुई हैं। 
इसी गुफा में एक शिला पर एक राक्षस की आकृति बनी हुई है। जिसे परशुराम ने अपने फरशे से मारा था। परशुराम महादेव से लगभग 100 किमी दूर महर्षि जमदगनी की तपोभूमि है, जहां परशुराम का अवतार हुआ।
कुछ ही मील दूर मातृकुंडिया नामक स्थान है जहां परशुराम ने अपने पिता की आज्ञा से माता रेणुका का वध किया था।
हर साल श्रावण शुक्ल षष्ठी और सप्तमी को यहां विशाल मेला लगता है। पाली नगर से लगभग 35 किमी दूर दक्षिण-पश्चिम दिशा में शाली का पहाडिय़ों में स्थित गुफा मंदिर में जमदगनी ऋषि ने तपस्या की थी।
जलप्रपात के नजदीक गुफा में विराजे स्वयंभू शिवलिंग की प्रथम प्राण प्रतिष्ठा परशुराम के पिता जमदगनी ने ही की थी।
इस गुफा में होती है मां का वध करने वाले ईश्वर की पूजा
शिवलिंग पर एक छिद्र बना हुआ है जिसके बारे में मान्यता है कि इसमें दूध का अभिषेक करने से दूध छिद्र में नहीं जाता जबकि पानी के सैकड़ों घड़े डालने पर भी वह नहीं भरता और पानी शिवलिंग में समा जाता है।

इस भूल भुलैया में दफन है अरबों का खजाना, जो भी गया अंदर नहीं लौटा वापस

क्या महम कस्बे के दक्षिण में सदियों पहले बनी बावड़ी में अरबों रूपए का खजाना छुपा हुआ है? क्या इसमें बिछा सुरंगों का जाल दिल्ली, हिसार और लाहौर तक जाता है? यह कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो आज भी लोगों के लिए रहस्य बने हुए हैं। मुगलकाल की यादों व रहस्यों को अपने अंदर समेटे इस बावड़ी का अस्तित्व समाप्त होने के कगार पर है लेकिन आज तक इस गुत्थी को कोई सुलझा नहीं पाया।

स्थानीय लोगों का मानना है कि इसमें अरबों का खजाना है। ज्ञानी चोर के नाम से मशहूर महम की ये ऐतिहासिक बावड़ी हमें आज भी मुगलकाल के वक्त की याद दिलाती है। फिलहाल ये सरकार व पुरातत्व विभाग की अनदेखी का शिकार है। स्थानीय लोग भी इस बारे में प्रशासन से कई बार गुहार लगा चुके हैं लेकिन नतीजा शिफर ही रहा।

इस भूल भुलैया में दफन है अरबों का खजाना, जो भी गया अंदर नहीं लौटा वापस
बावड़ी में लगे फारसी भाषा के एक अभिलेख के अनुसार इस स्वर्ग के झरने का निर्माण उस समय के मुगल राजा शाहजहां के चैबदार सैद्यू कलाल ने 1069 एएच यानि 1658-59 एडी में करवाया था। यह बावड़ी विशाल है। इसमें एक कुआं है जिस तक पहुंचने के लिए 101 सीढिय़ां उतरनी पड़ती हैं। इसमें कई कमरे भी हैं, जो कि उस जमाने में राहगीरों के आराम के लिए बनवाए गए थे। स्थानीय लोगों की मानें तो इसमें सुरंगों का जाल है जो कि दिल्ली और लाहौर तक जाता है। मगर रहस्य आज भी बरकरार है। लोगों का मानना है कि इसमें अरबों का खजाना है। सरकार द्वारा उचित देखभाल न किए जाने के कारण यह बावड़ी मिट्टी में मिलने को बेताब है। इसके बुर्ज व मंडेर गिर चुके हैं। कुएं के अंदर स्थित पानी काला पड़ चुका है।
पानी के अंदर गंदगी व अन्य तरह की वस्तुएं तैरती हुई देखी जा सकती हैं। सफाई की कोई व्यवस्था नहीं है। चमगादड़ों ने नीचे जाने वाली सीढिय़ों में अपना डेरा जमा लिया है। लोहे के दरवाजे जाम हो चुके हैं। जगह-जगह से टूटने के कारण छोटी ईंटों का मलबा बावड़ी के अंदर बेतरतीब तरीके से पड़ा है। इस बारे में जब इतिहासकारों से बातचीत की तो उन्होंने भी इसके खस्ताहाल पर चिंता जताई और कहा कि पुरातत्व विभाग के अंतर्गत होने के बावजूद भी इसकी देखभाल नहीं की जा रही है। इस बावड़ी को ज्ञानी चोर की बावड़ी के नाम से जाना जाता है। लोगों का कहना है कि ज्ञानी चोर एक शातिर चोर था जो धनवानों का लूटता और इस बावड़ी में छलांग लगाकर गायब हो जाता और अगले दिन फिर राहजनी के लिए निकल आता था।
इस भूल भुलैया में दफन है अरबों का खजाना, जो भी गया अंदर नहीं लौटा वापस 
लोगों का यह अनुमान है कि ज्ञानी चोर द्वारा लूटा गया सारा धन इसी बावड़ी में मौजूद है।  लोक मान्यताओं के अनुसार ज्ञानी चोर का अरबों का खजाना इसी में दफन है। जो भी इस खजाने की खोज में अंदर गया वो इस बावड़ी की भूलभुलैया में खो गया और खुद एक रहस्य हो गया। लोगों का कहना है कि उस समय का प्रसिद्व ज्ञानी चोर चोरी करने के बाद पुलिस से बचने के लिए यहीं आकर छुपता था। कई जानकार इस जगह को सेनाओं की आरामगाह बताते हैं। उनका कहना है कि रजवाड़ों में आपसी लड़ाई के बाद राजाओं की सेना यहां रात को विश्राम करती थी। छांव व पानी की सुविधा होने के कारण यह जगह उनके लिए सुरक्षित थी।
 
लेकिन इतिहासकारों की माने तो ज्ञानी चोर के चरित्र का जिक्र इतिहास में कहीं नहीं मिलता। अत: खजाना तो दूर की बात है। इतिहासकार डॉ. अमर सिंह ने कहा कि पुराने जमाने में पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए बावडिय़ां बनाई जाती थीं। लोगों का कहना है कि इतिहासकारों को चाहिए कि बावड़ी से जुड़ी लोकमान्यताओं को ध्यान में रखकर अपनी खोजबीन फिर नए सिरे से शुरू करें ताकि इस बावड़ी की तमाम सच्चाई जमाने के सामने आ सके। कहने को तो ये बावड़ी पुरातत्व विभाग के अधीन है मगर 352 सालों से कुदरत के थपेड़ों ने इसे कमजोर कर दिया है। जिसके चलते इसकी एक दीवार गिर गई है और दूसरी कब गिर जाए इसका पता नहीं। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार प्रशासन से इसकी मरम्मत करवाने की गुहार लगा चुके हैं।
इस भूल भुलैया में दफन है अरबों का खजाना, जो भी गया अंदर नहीं लौटा वापस
ज्ञानी चोर की गुफा के नाम से आसपास के क्षेत्र में लोकप्रिय हो चुकी बावड़ी जमीन में कई फुट नीचे तक बनी हुई है। इसमें एक कुआं है। कुएं के उपरी सिरे पर एक पत्थर लगा हुआ है। जानकारों का कहना है कि इस पर फारसी भाषा में ‘स्वर्ग का झरना' लिखा हुआ है। किवदंती है कि अंग्रेजों के समय में एक बारात सुरंगों के रास्ते दिल्ली जाना चाहती थी। कई दिन बीतने के बाद भी सुरंग में उतरे बाराती न तो दिल्ली ही पहुंच पाए और न ही वापस निकले। किसी अनहोनी घटना के चलते अंग्रेजों ने इन गुफाओं को बंद कर दिया। ये अभी भी बंद पड़ी हैं।
इस भूल भुलैया में दफन है अरबों का खजाना, जो भी गया अंदर नहीं लौटा वापस